[पिछ्ले भागों ( भाग - 1 , भाग-2 , भाग - 3) में हम जान चुके हैं कि कैसे संस्कृत कृतियों , हिन्दी कथाकारों की कृतियों और क्षेत्रीय भाषा की कृतियों पर भारतीय फिल्में बनती रही हैं,अब जानते हैं किस प्रकार विदेशी साहित्यकारों की कृतियों पर भारतीय फिल्में बनायी गयी। ऐसी फिल्मों की एक लंबी सूची है, जिसमें कुछ की जानकारी यहाँ दी गयी है]
विदेशी साहित्यकार
भारतीय फिल्में उद्योग की उदारता और विश्वबंधुत्व का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि उसने भारतीय साहित्य के साथ-साथ विदेशी साहित्य को भी अपनाया। उन्होंने अंग्रेजी, फारसी, फ्रेंच, जर्मन आदि भाषाओं की साहित्यिक कृतियों को निर्मित कर दर्शकों को भेंट किया।
एक्सेलसियर फिल्म कम्पनी ने शेक्सपीयर के नाटक ‘हैमलेट’ पर इसी नाम की एक मूक फिल्म हेमलेट (1928), सागर फिल्म कंपनी ने सोहराब मोदी के निर्देशन में (1935) में हिन्दुस्तान चित्र द्वारा किशोर साहू के निर्देशन में (1954) में भी सवाक फिल्म के रूप में निर्माण किया गया। उनकी प्रमुख कृति ‘कामेडी ऑफ एरर्स’ पर रंजित मूवीटोन ने जयंत देसाई के निर्देशन में भूल-भुलैया (1933) का निर्माण किया। इसी नाटक पर बाद में राजन पिक्चर्स ने डायरेक्टर मौहम्मद हुसैन के निर्देशन में हंसते रहना (1950) विमल राय प्रोडक्शन द्वारा देबू सेन के निर्देशन में दो दुनी चार (1968) और गुलजार के निर्देशन में अंगूर (1982) के नाम से निर्माण किया गया। शेक्सपीयर की एक अन्य कृति ‘टेमिंग ऑफ दि श्रु’ पर मदन थियेटर्स ने जे. जे. मदन के निर्देशन में हठिली दुल्हन (1932) का निर्माण किया। शेक्सपीयर की एक अन्य कृति ‘टेम्पैस्ट’ पर एसोसिएटेट प्रोडक्शन ने दिनेश रंजनदास के निर्देशन में एक फिल्म आंधी (1940) का निर्माण किया। शेक्सपीयर के बहुचर्चित नाटक ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ को राधा फिल्म कंपनी ने इसी नाम से जे. जे. मदन के निर्देशन में (1941) में निर्मित किया। शेक्सपीयर के ही एक अन्य नाटक ‘मेजर फॉर मेजर’ पर एक फिल्म पाक दामन (1940) का निर्माण हुआ। कलकत्ते की राधा फिल्म कम्पनी ने शेक्सपीयर के ही एक अन्य नाटक ‘मर्चेन्ट ऑफ वेनिस’ पर इसी नाम से 1941 में एक फिल्म बनाई । बंबई की नरगिस आर्ट कंसर्न नामक संस्था ने शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक ‘रोमियों एण्ड ज्यूलियट’ पर इसी नाम से एक फिल्म का निर्माण 1947 में किया।
गजानन्द जागीरदार ने फ्रेंच लेखक विक्टर ह्यूगो के उपन्यास ‘ला मिजरेबल’ पर जेलयात्रा (1947) तथा बाद में सोहराब मोदी ने मिनर्वा मूवीटोन के बेनर तले कुंदन (1955) नाम से फिल्म का निर्माण किया।
किशोर साहू ने जेम्स हिल्टन की ‘रैन्डम हारवेस्ट’ कृति पर साजन (1947) फिल्म का निर्माण किया।
एलेग्जेंडर ड्यूमा के उपन्यास ‘दि काउन्ट आफ मान्टे क्रिस्टो’ पर जुलदुर्ग (1954) नामक फिल्म कन्नड़ भाषा में बनाई गई।
प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक सर वाल्टर स्कॉट के उपन्यास ‘लेडी ऑफ दि लेक’ पर मोहन पिक्चर्स ने सरोवर की सुन्दरी (1942) का निर्माण ए. बी. खान के निर्देशन में किया।
उपन्यासकार ढाफने दि मारियर की कृति ‘रेबेका’ पर गीतांजलि पिक्चर्स ने वीरेन्द्रनाथ के निर्देशन में कोहरा (1964) का निर्माण किया।
प्रसिद्ध फिल्म निर्माता गुरूदत्त ने चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यास ‘आलिवर ट्विस्ट’ केा आत्माराम के निर्देशन में चंदा और बिजली (1965) का निर्माण किया।
आर. एल. स्टिवेंसन की लोकप्रिय कृति ‘डा. जेकल एण्ड मि. हाईड’ पर निर्माता निर्देशक राजतिलक ने चेहरे पर चेहरा (1980) फिल्म का निर्माण किया।
तक्षशिला आर्ट ने निर्देशन बी.सी. कश्यप के निर्देशन में थामस हार्डी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘टेस ऑफ दि अरबल डी वैले’ को दुल्हन एक रात की (1966) के रूप में निर्माण किया।
लियो टालस्टाय के उपन्यास ‘रिजेक्शन’ पर डायमंड पिक्चर्स ने जी. पी. पंवार के निर्देशन में दुनिया क्या है (1938) फिल्म का निर्माण किया।
दास्तावस्की के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास ‘क्राइम एण्ड पनिशमेंट’ पर पारिजात पिक्चर्स ने रमेश सहगल के निर्देशन में फिर सुबह होगी (1958) का निर्माण किया जिसमें राजकपूर का सशक्त अभिनय दर्शकों को आज तक याद है। इसी कथानक पर बुंदेलखण्ड पिक्चर्स ने एन. ए. एन. अंसारी के निर्देशन में फिल्म जुर्म और सजा (1974) का निर्माण किया।
एल्फ्रेड हिचकाक कृत ‘स्ट्रेन्जर्स आन दि ट्रेन’ को आधार बनाकर फिल्मिस्तान ने एक सफल फिल्म शर्त (1954) बनाई।
विदेशी लेखकों की रचनाओं पर केवल फिल्में ही नहीं बनाई गई वरन उनके गीतों को भी फिल्मों में सम्मिलित किया गया। उदाहरण के लिये प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि एच. डब्लू. लॉगफैलों के गीत ‘इन दि वर्ल्ड्स ब्रौडफील्ड आफ बैटल’ (सांग आफ लाइफ) को दुनिया ना माने (1937) में प्रयोग किया गया।





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