[पिछ्ले भाग में आपने पढ़ा कि किस प्रकार साहित्य का हिन्दी फिल्मों में योगदान रहा है। संस्कृत कथाकारों की बहुत सी कालजयी कृतियों पर अनेकों फिल्में बन चुकी हैं। यही बात हिन्दी कथाकारों पर भी लागू होती है। इस भाग में जानते हैं उन फिल्मों के बारे में को किसी हिन्दी साहत्यिक कृति पर बनी।]
हिन्दी कथाकार
अन्य भाषाओं के साहित्य की तरह हिन्दी साहित्य की समृद्धता को भी हिन्दी फिल्मों में सहजता के साथ देखा जा सकता है। हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकारों ने समय-समय पर अपने योगदान से हिन्दी सिनेमा को भरपूर सिंचित किया है।
प्रख्यात लेखक पंडित सुदर्शन की कहानियों पर न्यूथ्येटर्स ने बंगला में भाग्यचक्र (1935) और हिन्दी में धूपछांव (1935) फिल्में बनाई जो काफी लोकप्रिय हुई। बंबई की सागर फिल्म कम्पनी ने भी पंडित सुदर्शन ने एक फिल्म ग्रामोफोन सिंगर (1938) की कथा लिखी। पंडित सुदर्शन ने सोहराब मोदी की फिल्म सिकंदर (1941) के बड़े सशक्त संवाद लिखे थे जिन्हें उस फिल्म के दर्शक आज तक नहीं भूल सके हैं।
हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध नाटककार भारतेन्दु हरिशचन्द्र के हास्य नाटक ‘अंधेर नगरी’ पर चित्र महल फिल्म कंपनी ने समीम भगत के निर्देशन में अंधेर नगरी चौपट राजा (1955) का निर्माण किया।
हिन्दी के सुप्रसिद्ध कहानीकार चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ पर इसी नाम से मनि भटटाचार्या के निर्देशन में विमल राय प्रोडक्शन ने उसने कहा था (1960) फिल्म का निर्माण किया।
एक अन्य लेखक व राजनेता सेठ गोविन्ददास ने भी आदर्श चित्र (इलाहाबाद) की फिल्म धुंआधार (1935) की कथा लिखी जिसमें लीला चिटनिस ने पहली बार नायिका की भूमिका अदा की थी। इस फिल्म के गीत पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र ने लिखे थे।
हिन्दी साहित्य के प्रख्यात कथाकार पाण्डेय बेचन शर्मा ”उग्र“ ने शक्ति मूवीटोन की फिल्म आजा़दी (1935) और बी. के. दवे ब्रदर्स की फिल्म रत्न मंजरी (1935) की कथा व संवाद लिखे थे। नेशनल थियेटर्स द्वारा निर्मित फिल्म जांबाज़ मलिका (1936) के लेखक भी पंडित उग्र थे।
बाबू भगवती चरण वर्मा की कहानी पर बनी फिल्म चित्रलेखा (1941) भारतीय फिल्म इतिहास का एक सशक्त दस्तावेज़ है। किशोर साहू की फिल्म कुंवारा बाप की फिल्म के पटकथा व संवाद भी आप ने ही लिखे थे। भगवती बाबू द्वारा किशोर साहू की फिल्म राजा (1943) में लिखा गया गीत ‘हम दीवानों की क्या हस्ती’ अपने समय का काफी लोकप्रिय गीत रहा था। पुप्पा पिक्चर्स ने पुनः केदार शर्मा के निर्देशन में चित्रलेखा (1964) का निर्माण किया। अवतार पिक्चर्स ने निर्देशक जोगेन्द्र शैली के निर्देशन में वर्मा जी के एक अन्य उपन्यास पर वह फिर नहीं आयी (1981) का निर्माण भी किया।
अमृतलाल नागर ने किशोर साहू की फिल्म बहुरानी (1940) की पटकथा व संवाद और राजा (1943) फिल्म में सशक्त संवाद लिखे थे। प्रख्यात नर्तक उदयशंकर की बैले-फिल्म कल्पना (1945) की पटकथा व संवाद भी नागर जी द्वारा ही लिखे गये थे। जिसमें प्रकृति कवि जयशंकर प्रसाद ने गीतों की रचना की थी। प्रसाद जी ने नल दमयन्ती (1945) और संगम (1941) फिल्मों में भी गीतों की रचना की थी। अमृतलाल नागर की कहानी पर लखनऊ के आइडियल फिल्म स्टूडियों में एक फिल्म चोर (1950) का भी निर्माण हुआ था।
लखनऊ के ही एक कलाकार वी. एन. मिश्रा ने प्रसिद्ध लेखक एन. एम. केलकर की कहानी पर एक फिल्म अमर प्रेम उर्फ राधाकृष्ण (1947) का निर्माण बंबई में किया था। जिसमें मधुबाला, राजकपूर, निम्बालकर आदि कलाकार थे।
ख्वाजा अहमद अब्बास उन भारतीय लेखकों में एक हैं जिनकी कृतियों का विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद हुआ है। एक लेखक के रूप में इन्होंने नया संसार (1941), नई दुनिया (1942), नई कहानी (1943), पन्ना (1944), डा. कोटनिस की अमर कहानी (1946), धरती के लाल (1946), आज और कल (1947), आवारा (1951), अनहोनी (1952), राही (1953), मुन्ना (1954), श्री 420 (1955), आधी रात (1957) और काला पर्वत (1971) जैसी प्रतिष्ठित फिल्मों का लेखन कार्य किया।
हिन्दी के सशक्त कहानीकार मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों पर भी अनेक फिल्में बनी जिनमें मिल या मजदूर (1934), सेवा सदन या बाजा़रे हुस्न (1934), नव जीवन (1935), शेरदिल औरत (1935), रंगभूमि (1946), एक गांव की कहानी (1957), हीरा मोती (1959), सौतेला भाई (1962), गोदान (1963), गबन (1966), शतरंज के खिलाड़ी (1977) और गोदान (1983) में उल्लेखनीय हैं।
लेखक कृष्णचन्दर ने मन की जीत (1944) से लेखक रूप में फिल्म उद्योग में प्रवेश किया। बाम्बे टाकीज़ के लेखन विभाग में भी उन्होंने कुछ समय कार्य किया। गुलामी (1945), सराय के बाहर (1947), दिल की आवाज़ (1948) के निर्माता व लेखक बनने के बाद उन्होंने पुतली (1950), हंसते आंसू (1950), आंदोलन (1950), ज़लज़ला (1952), शिकस्त (1953) आदि फिल्में लिखीं।
1935 में आयी फिल्म धूप छाँव का गाना
"बाबा मन की आँखें खोल"
विख्यात लेखक पदमश्री राजेन्दर सिंह बेदी ने अनुराधा (1940), बंधन (1940), बड़ी बहन (1949), दाग़ (1952), रेल का डिब्बा (1953), गर्म कोट (1955) मिर्जा गा़लिब (1954), देवदास (1955) बसन्त बहार (1956), अब दिल्ली दूर नहीं (1957), अभिमान (1957), मधुमती (1958), मेरे सनम (1965), सत्यकाम (1969), दस्तक (1970), एक चादर मैली सी (1986) आदि अनेक फिल्म लिखकर विभिन्न पुरस्कार प्राप्त किये।
आचार्य चुतरसेन शास्त्री की प्रसिद्ध कृति पर बी.आर. चोपड़ा ने धर्मपुत्र (1961) फिल्म का निर्माण किया।
आर. के. नारायण के उपन्यास पर निर्माता देवानन्द ने द्वारा निर्मित गाइड (1965) फिल्म एक यादगार फिल्म बनी जिसके लिये नारायण को 1966 में सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिये फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। इनके एक उपन्यास ‘फाइनेंशियल एक्सपर्ट’ पर आधारित एक कन्नड़ फिल्म बैंकर मागय्या का भी निर्माण हुआ था।
उर्दू के प्रख्यात लेखक सआदत्त हसन मण्टो की कहानी पर हिन्दुस्तान सिनेटोन द्वारा निर्देशक गुंजल के निर्देशन में अपनी नगरिया (1940), ताजमहल पिक्चर्स द्वारा निर्मित उजाला (1942) तथा बेगम (1945) निर्मित हुई। उनकी एक अन्य कृति पर नौकर (1943) फिल्म बनी। फिल्मिस्तान कंपनी ने भी उनकी एक कृति पर 8 डेज़ (1946) फिल्म का निर्माण किया। किसान कन्या (1937) की पटकथा व संवाद मण्टो ने ही लिखे थे।
स्त्रियों के अधिकारों व उनकी स्वतंत्रता की पक्षधर लेखिका इस्मत चुगताई ने ज़िद्दी (1948),
आरजू (1950), बुज़दिल (1951) सोने की चिड़िया (1958), लालारूख (1958) और गरम हवा (1973) जैसी सफल और लोकप्रिय फिल्मों का लेखन किया। गरम हवा के लिये उनको कैफी आज़मी के साथ सर्वश्रेष्ट कहानी का पुरस्कार प्रदान किया गया था।
प्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र ने प्रसिद्ध कथाकार फणीश्वरनाथ रेणू की कहानी पर एक बहुत सुन्दर फिल्म ‘तीसरी कसम’ (1966) का निर्माण किया जिसमें राजकपूर और वहिदा रहमान का बड़ा सशक्त अभिनय था।
हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार जैनेन्द्र कुमार के उपन्यास पर महेन्द्र विनायक ने त्यागपत्र (1979) फिल्म का निर्माण किया था।
प्रख्यात लेखक रांगेयराघव राय और उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ भी फिल्मों में भाग्य आजमाने के लिये आए जिन्होंने क्रमशः लंका दहन (1933) तथा सफर (1970) फिल्मों के लिये संवाद लिखे।
कथाकार मोहन राकेश की कहानी पर बनी मणि कौल प्रोडक्शन द्वारा निर्मित फिल्म आषाढ़ का एक दिन (1971) और रोचक पंडित प्रोडक्शन द्वारा निर्मित एवं मणि कौल द्वारा निर्देशित उसकी रोटी (1971) और निर्मल वर्मा की कहानी पर कुमार शाहनी द्वारा निर्देशित फिल्म माया दर्पण (1972) आज भी दर्शकों की स्मृति में तरोताजा हैं।
उपन्यासकार राजेन्द्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ पर सिने आई फिल्मस ने बासु चटर्जी के निर्देशन में फिल्म सारा आकाश (1969) का निर्माण किया।
निर्माता निर्देशक अवतार कृष्ण कौल ने रमेश बक्शी के उपन्यास ‘18 सूरज के पौधे’ पर 27 डाउन (1978) फिल्म का निर्माण किया।
निर्देशक बासु चटर्जी ने सुरेश जिंदल के लिए मनु भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर एक यादगार फिल्म रजनीगंधा (1974) का निर्माण किया।
निर्माता कृतिमान फिल्म्स ने लेखक महावीर अधिकारी के उपन्यास ‘तलाश’ पर उमेश माधुर के निर्देशन में जिंदगी और तूफान (1975) फिल्म का निर्माण किया।
हिन्दी साहित्य के नक्षत्र पंडित माखनलाल चतुर्वेदी की पौराणिक कृति ‘कृष्णार्जुन यु़द्ध’ पर इसी नाम से बलवंत पिक्चर्स ने सी. आर. कोठारी के निर्देशन में कृष्णार्जुन युद्ध (1934) का निर्माण किया।
निर्माता अशोक वाजपेयी ने मणि कौल के निर्देशन में गजानन्द माधव के ‘मुक्ति बोध’ कहानी पर एक गंभीर फिल्म सतह से उठता आदमी (1981) का निर्माण किया।
धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध उपन्यास ‘सूरज का सातवा घोड़ा’ को श्याम बेनेगल ने इसी नाम से 1993 में निर्देशित कर फिल्म जगत को एक अनुपम कृति प्रदान की थी।
भारतवर्ष के उपन्यासकारों में गुलशन नंदा का नाम प्रमुखता के साथ लिया जाता है। उनके उपन्यास पर इन्दरराज आनन्द के निर्देशन में अंजली पिक्चर्स ने फिल्म फूलों की सेज (1964) का निर्माण किया। उनके एक अन्य उपन्यास पर प्रसिद्ध निर्माता शक्ति सांमत ने कटी पतंग (1970) तथा बप्पी सोनी ने झील के उस पार (1973) सफल फिल्मों का निर्माण किया।
हिन्दी के एक अन्य लोकप्रिय उपन्यासकार कुशवाहा कांत के उपन्यास पर निर्माता निर्देशक कुंदन कुमार ने परदेश (1970) का निर्माण किया।
फिल्म पत्रकारिता के पितामह और प्रख्यात लेखक श्रृषभचरण जैन के उपन्यास ‘तीन इक्के’ पर इसी नाम से निर्माता निर्देशक जोगेन्द्र ने फिल्म तीन इक्के (1980) का निर्माण किया।
भारतीय ज्ञानपीठ तथा मैग्सेसे पुरस्कार विजेता लेखिका महाश्वेता देवी के उपन्यास पर निर्माता निर्देशक गोविंद निहलानी की फिल्म हजार चौरासी की मां (1997) काफी चर्चा में रही है।




