[भारतीय सिनेमा के इतिहास में साहित्य का एक अलग ही स्थान रहा है। एक समय ऐसा था जब साहित्यकारों की कृतियों को न केवल आदर सम्मान व रूचि के साथ पढ़ा जाता था वरन उनको आत्मसात करने के प्रयास भी किये जाते थे। उसी दौरान बहुत सी साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनी...किन्तु आज के इस आपाधापी और चमक-दमक के दौर में ये साहित्यकार और इनकी बहुमूल्य कृतियां जो हमारे समाज के लिए कभी पथ-प्रदर्शक के रूप में जानी जाती थी, पता नहीं कहां खोती जा रही हैं। इसी चिंता को समेटे प्रस्तुत है यह श्रंखला जिसमें हमें विभिन्न भाषा की साहित्यकारों पर बनी भारतीय फिल्मों की बात करेंगे।]
सम्पूर्ण विश्व में भारतवर्ष ही किंचित एक अकेला ऐसा देश है जिसकी संस्कृति सृष्टि के रचनाकाल से जुड़ी हुई हैं और सृष्टि के निर्माता श्री ब्रह्माजी के मुख से उच्चारित वेदों के द्वारा काव्य-साहित्य की जो सरिता प्रवाहित हुई, वह आज तक अविरल बहती आ रही है। वेद, पुराण, उपनिद, रामायण और महाभारत जैसी महान कृतियों के रचयिताओं ने हमारे साहित्य जगत को ही समृद्ध नहीं किया वरन् धर्म, ज्ञान, विज्ञान, अध्यात्म तथा अन्य अनेक विष्यों के तेज से सम्पूर्ण पृथ्वी को भी आलोकित किया है। हमारे देश की सभ्यता संसार की प्राचीनतम सभ्यताओं में गिनी जाती है। वैवस्वत मनु से महाभारत तक के काल को वैदिक युग कहा गया है जिसमें ऋषिगण गृत्समद, वामदेव, विश्वमित्र, भारद्वाज, अत्रि, वशिष्ट, शिवि, प्रतर्दन, लोपामुद्रा, देवापि आदि रचनाकारों ने विभिन्न विषयों पर रचनाओं का निर्माण कर भारतीय साहित्य को पोषित किया। संस्कृत भाषा के आदि कवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’ और महर्षि वेदव्यास द्वारा संकलित ‘महाभारत’ देश के महानतम ग्रंथों में गिने जाते हैं। उत्तर-वैदिक काल में संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का एक स्वरूप काव्य और नाटिकाओं के रूप में भी देखने को आया। संस्कृत के प्रसिद्ध कवि भास, कालिदास, भवभूति, अश्वघोष, शूद्रक और भरत मुनि ने अपने नाटकों द्वारा साहित्य को श्रेष्टतम रचनाएं समर्पित की। भवभूति का ‘उत्तर रामचरित’, बाणभट्ट का ‘कादम्बरी’ हर्षवर्धन के ‘रत्नावली’ व ‘नागानन्द’, कालिदास के ‘ऋतुसंहार’, ‘कुमार संभव’, ‘मेघदूत’, ‘अभिज्ञानशाकुंतलम’ व ‘रघुवंश’ ग्रन्थ संस्कृत साहित्य के शिरोमणी कहे जाते हैं।
एक समय ऐसा था जब इन साहित्यकारों की कृतियों को न केवल आदर सम्मान व रूचि के साथ पढ़ा जाता था वरन उनको आत्मसात करने के प्रयास भी किये जाते थे। किन्तु आज के इस आपाधापी और चमक-दमक के दौर में ये साहित्यकार और इनकी बहुमूल्य कृतियां जो हमारे समाज के लिए कभी पथ-प्रदर्शक के रूप में जानी जाती थी, पता नहीं कहां खोती जा रही हैं। …..फिल्मों में आज मुख्यतः तड़क-भड़क, सेक्स, अश्लीलता, नंगापन और मारधाड़ की जो तस्वीर नजर आ रही है वे एक जमाने में निन्दा और आलोचना का विषय बना करती थी।
कालान्तर में देश के भीतर विभिन्न भाषाओं ने जन्म लिया और संस्कृत और प्राकृत भाषाओं के साथ-साथ हिन्दी, फारसी, उर्दू, कौरवी, राजस्थानी, ब्रजभाषा, बंगला, तमिल, तेलगू, मराठी, गुजराती व अन्य भाषाओं का साहित्य सृजित होता रहा है।
मुगलकाल में कबीर, नानक, तुलसी, सूरदास, स्वामी रामानन्द, मीराबाई, रसखान, खानखाना, रहीम, केशव, सेनापति, बिहारी, भूषण, महाप्रभू चैतन्य आदि कवियों ने जहां हिन्दी काव्यजगत को एक से बढ़कर एक अनुपम रचनाएं दी वहीं अंग्रेजों के शासनकाल में भारतेन्दु हरिशचन्द्र, बालकृष्णभट्ट, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, माइकल मधुसूदन दत्त, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, दीनबन्धु मित्र, देवेन्द्रनाथ ठाकुर, हेमचन्द्र बनर्जी, शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय काज़ी नजरूल इस्लाम, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचन्द, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, महावीर प्रसाद द्विवेदी और देवकीनन्दन खत्री जैसे महान साहित्यकारों ने भारतीय साहित्य को एक पराकाष्ठा प्रदान की। बाद में राहुल सांकृत्यायन, महादेवी वर्मा, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ और मैथलीशरण गुप्त जैसे श्रेष्ठ रचनाकारों ने हिन्दी साहित्य को सिंचित कर अमरत्व प्राप्त कराया। इस सन्दर्भ में यदि उर्दू भाषा के साहित्यकार- गा़लिब, जौक, मोमिन, मीर, हाली, अकबर, इकबाल; मराठी, भाषा के लोकमान्य तिलक, हरिनायाण आपटे, मामा वारेरकर, एन. एम. कालेलकर; गुजराती के के. एम. मुंशी, बलवन्तराम आचार्य, रमनलाल देसाई आदि का उल्लेख न किया जाय तो न्यायोचित न होगा।
एक समय ऐसा था जब इन साहित्यकारों की कृतियों को न केवल आदर सम्मान व रूचि के साथ पढ़ा जाता था वरन उनको आत्मसात करने के प्रयास भी किये जाते थे। किन्तु आज के इस आपाधापी और चमक-दमक के दौर में ये साहित्यकार और इनकी बहुमूल्य कृतियां जो हमारे समाज के लिए कभी पथ-प्रदर्शक के रूप में जानी जाती थी, पता नहीं कहां खोती जा रही हैं। इन रचनाकारों की कलम ने समाज में व्याप्त कुरीतियों, अव्यवस्थाओं, असमानताओं और विषमताओं को बड़ी कुशलता के साथ उजागर किया था और उनके दुष्परिणामों का सशक्त चित्रण भी किया था। इस दिशा में अनेक फिल्म निर्माताओं ने ऐसी अनेक साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाकर समाज के कोने-कोने में उनका संदेश घर-घर तक पहुंचाया।
फिल्मों में आज मुख्यतः तड़क-भड़क, सेक्स, अश्लीलता, नंगापन और मारधाड़ की जो तस्वीर नजर आ रही है वे एक जमाने में निन्दा और आलोचना का विषय बना करती थी। चाहे मूक फिल्मों का युग रहा हो या सवाक फिल्मों का …….. फिल्म निर्माताओं ने श्रेष्ठ साहित्यकारों की उत्कृट कृतियों पर फिल्में बनाकर समाज के कुंठित दर्शकों को स्वच्छ मार्ग पर अग्रसर करने का मार्ग प्रशस्त किया है।
आइए! देश के साहित्यकारों द्वारा सृजित उत्कृष्ट रचनाओं पर आधारित फिल्मों के एक संक्षिप्त इतिहास का अवलोकन किया जाय जिसमें से कुछ फिल्में भारतीय फिल्म इतिहास में अमर हो चुकी हैं।
संस्कृत साहित्यकार
जैसा कि प्रारम्भ में ही लिखा गया है, संस्कृत के अनेक लेखकों ने अपनी कृतियों से साहित्य का जो पोषण किया उसी के फलस्वरूप उन साहित्यकारों की रचनाओं को विश्व की अनेक भाषाओं में न केवल अनुदित किया गया वरन उन पर अनके फिल्में भी बनाई गई। रामायण, महाभारत और विभिन्न पुराणों की पृष्ठभूमि में सैकड़ों कथाओं को पर्दे पर प्रस्तुत किया जा चुका है।
संस्कृत कवि शूद्रक द्वारा रचित नाटक मृच्छकटिक ने फिल्म निर्माताओं को काफी आकर्षित किया है जिस पर आधारित अनेक फिल्में बन चुकी हैं। ओरियन्ट फिल्म मैन्यूफैक्चरिंग कम्पनी ने सुचेत सिंह के निर्देशन में मृच्छकटिक (1920) नाम से ही एक मूक फिल्म का निर्माण किया था। दादा साहब फालके ने बसन्त सेना (1929) नाम से तथा इंडियन आर्ट प्रोडक्शन ने भी बसन्त सेना या मृच्छकटिक (1931) नाम से मूक फिल्मों का निर्माण किया। बसन्त सेना नाम से ही बसन्त सिनेटोन ने 1934 और अत्रे पिक्चरर्स ने 1942 में भी फिल्में बनाई । उल्लेखनीय है कि मृच्छकटिक पर आधारित बसन्त सेना (1941) में कन्नड़ भाषा में भी बनाई गई थी। अभिनेता शशि कपूर ने इसी नाटिका के उपर एक फिल्म उत्सव (1985) में निर्मित की जिसका निर्देशन गिरीश कर्नाड ने किया । इस फिल्म की नायिका रेखा थी।
कवि कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुन्तल’ को तो अनेक-अनेक बार पर्दे पर लाया गया है। फिल्मों के मूक युग में शकुन्तला (1920) को एक ओर ओरियन्टल फिल्म मैन्यूफैक्चरिंग कम्पनी ने बनाया तो दूसरी ओर इसी व र्श 1920 में पाटनकर फ्रैन्ड्स ने भी शकुन्तला या लौस्ट रिंग का निर्माण किया। पुनः 1929 और 1932 में क्रमशः विक्टोरिया फातमा और सिने फिल्म एजेन्सी ने शकुन्तला का निर्माण किया।
फिल्मों का सवाक युग आने के बाद पुनः शकुन्तला का निर्माण क्रमशः मदन थ्येटर्स (1931), सरोज मूवीटोन (1931) और राजकमल कलामंदिर (1943) द्वारा किया गया। पुनः इसी कथानक पर व्ही .शांताराम ने स्त्री (1961) का भी निर्माण किया था जिसमें व्ही. शांताराम ने अभिनेत्री संध्या के साथ मुख्य भूमिका अभिनीत की थी।
कवि कालिदास के प्रसिद्ध काव्य मेघदूत पर कृति पिक्चर ने देवकी बोस के निर्देशन में एक फिल्म मेघदूत (1945) का निर्माण किया।
संस्कृत के महाकवि भवभूति द्वारा रचित ‘मालती माधव’ पर सरोज मूवीटोन ने ए. पी. कपूर के निर्देशन में मालती माधव (1933) नाम से ही चित्र का निर्माण किया। प्रसन्ना पिक्चर और एम. नीलकंठ ने पुनः मालती माधव के कथानक को अपने चित्र मालती माधव (1951) में फिल्माया ।
महाकवि भास द्वारा रचित लोकप्रिय नाटिका ‘स्वप्नवासव दत्तम’ पर अजन्ता सिनेटोन ने एक चित्र वासव दत्ता उर्फ शाही गवैया का निर्माण किया (1934) जिसका निर्देशन पी. वाई. आलटेकर ने किया था।
संस्कृत के ही एक अन्य लेखक श्री हर्ष द्वारा रचित नाटिका ‘नागानंद’ पर सम्राट सिनेटोन ने वाई पी. राव के निर्देशन में नागानन्द (1935) चित्र का निर्माण किया। हर्ष की एक अन्य नाटिका रत्नावली अमर पिक्चर्स ने सुरेन्द्र देसाई के निर्देशन में रत्नावली (1945) नाम से निर्मित किया। संस्कृत के प्रसिद्ध नाटककार व कवि बाण भट्ट की लोकप्रिय कृति ‘कादम्बरी’ पर लक्ष्मी प्रोडक्शन ने नन्दलाल जसवंत लाल के निर्देशन में कादम्बरी (1944) तथा मधु क्रियेशन ने एच. सी. वर्मा के निर्देशन में कादम्बरी (1976) का निर्माण किया।
काव्य और संगीत के क्षेत्र में बड़े आदर और सम्मान के साथ महाकवि जयदेव के ‘गीतगोविंद’ को भी तनु देसाई प्रोडक्शन ने गीत गेाविन्द (1947) नाम से निर्मित किया जिसके निर्देशक रामचंद ठाकुर थे।
अगले भाग में जारी…..





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