[पिछ्ले भाग में आपने पढ़ा कि किस प्रकार फोटोग्राफी के आविष्कार के बाद विश्व में धीरे धीरे चलचित्रों का प्रचलन बढ़ा और यह किस तरह से भारत में पहुँचा। बंबई में चलचित्र प्रदर्शित किये गये और लोगों नें इसमें काफी रुचि ली। यह चलन धीरे धीरे देश के अन्य हिस्सों में कैसे पहुँचा यही जानते हैं इस भाग में..... ]
लेखक : डा. आर.के.वर्मा
बंबई में ल्यूमियर बंधुओं के सिनेमेटोग्राफ शो के कुछ ही दिनों बाद कलकत्ता में भी फिल्म लहर चलनी शुरू हो गई और लोग इस ओर आकर्षित होने लगे। इसी वर्ष प्रोफेसर स्टीवेन्सन नामक एक अंग्रेज ने कलकत्ते के स्टार थियेटर में ल्यूमियर बंधुओं की कुछ फिल्मों का प्रदर्शन आयोजित किया। इसी के साथ सेंट जेवियर्स कालेज के फादर लाफोन ने भी कालेज के विद्यार्थियों को इस नए आविष्कार से परिचित कराने के लिये कालेज में अनेक फिल्म शो आयोजित कराए।
एक अन्य प्रमुख उद्यमी हीरा लाल सेन ने अपने भाई मोतीलाल सेन के साथ मिलकर 1898 के अंत मे एक सिने कैमरा और प्रोजेक्टर खरीद कर परीक्षण शुरू कर दिये। 1898 में उन्होंने व्यवसायिक दृष्टि से कलकत्ता में रायल बायस्कोप कम्पनी खोलकर विदेशी फिल्में आयात करने के साथ-साथ, स्थानीय स्तर पर भी क्लासिक थियेटर में होने वाले नाटकों का छायांकन करना शुरू कर दिया। सेन ने कलकत्ता के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर शूटिंग की और 1898 में ‘दि फ्लावर आफ परसिया’ नामक नृत्य और ‘एपेनोरमा ऑफ इन्डियन सिन्स एण्ड प्रोसेन्स का फिल्मांकन किया। जो 9 फरवरी 1898 को कलकत्ता के स्टार थियेटर में रिलीज की गई। सेन द्वारा फिल्मांकन किये गये सभी दृश्य उनके व्यवसायिक प्रदर्शनों के अंग होते थे, और इनको स्टेज प्रोग्राम्स के बाद अतिरिक्त आकर्षण के रुप में दिखया जाता था; जिन्हें स्थानीय दर्शक काफी रूचि से देखते थे। उनकी रायल बायस्कोप कम्पनी ने बंगाल, उड़ीसा व बिहार राज्यों में जाकर फिल्म प्रदर्शन भी शुरू कर दिए।
बंबई और कलकत्ता में फिल्मों की मची धूम से दक्षिण भारत भी प्रभावित हुए बिना न रह सका। 1897 में मद्रास के विक्टोरिया मेमोरियल हाल में एम.एडवर्ड नामक अंग्रेज ने पहला शो आयोजित किया।
1897 और 1900 के बीच बंबई के कुछ फिल्म उद्यमियों ने जैसे प्रोफेसर इन्डरसन ‘कोकोनट फेयर’, पूना रेसेज 98’(1898), ए ट्रेन एराइविंग एट चर्च गेट स्टेशन’(1898), ‘ताबूत प्रोसेशन एट कालबा देवी’(1900), आदि फिल्मों का फिल्मांकन किया। इनमें इलैक्ट्रिक इंजीनियर एफ.बी.थानावाला द्वारा 1900 में निर्मित ‘‘स्पैंलडिड न्यू व्यूज़ आफ बाम्बे’’ उल्लेखनीय थी, जिसमें बंबई के दर्शनीय स्थलों को चित्रित किया गया था और इसका निर्माण ‘थानावाला ग्रांड किनेटोस्कोप’ द्वारा किया गया था। बंबई में नववर्ष के उपलक्ष में 1 जनवरी 1900 को नावल्टी थियेटर में जहां फिल्म प्रदर्शन का विशेष शो आयोजित किया गया वहीं टिवोली थियेटर में भी 25 फिल्मों के शो आयोजित किए गए।
उधर दक्षिण भारत में 1900 में दक्षिण भारत का पहला सिनेमा-इलैक्ट्रिक थियेटर मद्रास के मांउट रोड पर मेजर वारविक और रेगिनाल्ड आयर द्वारा निर्मित किया गया और वहां पर व्यवसायिक रुप से फिल्में प्रदर्शित की जाने लगी। दो वर्ष बाद सरकार द्वारा अधिग्रिहीत किये जाने के कारण यह थियेटर बंद हो गया।
1901 में कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी द्वारा भारत के एक प्रतिभाशाली छात्र सिनयर रैंगलर आर.पी. परांजपे को गणितशास्त्र में डिस्टिंक्शन प्रदान किया गया। दिसम्बर में उनके भारत आगमन पर बंबई की चौपाटी पर एक भव्य स्वागत समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह के लिए सखाराम भाटवाड़ेकर उर्फ सावे दादा ने जो चित्रांकन किया, उसने उन्हें देश का पहला ‘न्यूजरील मेकर’ बना दिया। सावे दादा द्वारा निर्मित इस ‘न्यूज़ रील’ का नाम ‘‘दि फ्रेश इंडियन रेग्यूलर आफ कैंब्रिज’ रखा गया था।
इधर हीरालाल सेन ने कलकत्ता में क्लासिक थियेटर में आयोजित 7 विभिन्न नृत्यों का छायांकन किया और 9 फरवरी 1901 को इसी थियेटर में इनका प्रदर्शन भी किया।
जमशेद जी फ्रामजी मैडन नामक पारसी व्यापारी बंबई से आकर सपरिवार कलकत्ता में बस गए थै। प्रारंभ से ही थियेटर लाइन में उनकी रूचि थी और उनके इस शौक ने उनको थियेटर कम्पनी के साथ अनेक शहरों की सैर भी करा दी थी। विभिन्न प्रकार के व्यवसाय करते हुए भी मैडन अपने कलात्मक स्वभाव और थियेटर से कभी विमुख नहीं हुए। एक ऐसा समय भी आया कि जिस थियेटर कंपनी में वह काम किया करते थे उसी कंपनी को उन्होंने खरीद लिया और ‘मैडन थियेट्रिकल कम्पनी’ की स्थापना कर दी।
1902 में जे.एफ.मैडन ने कलकत्ता के मैदान में टैंट लगाकर व्यवसायिक रूप से ‘बायस्कोप शो’ प्रारंभ कर दिये, जिसके लिये उन्होंने फ्रांस के चार्ल्स पाथे की ‘पाथे फ्रेरस कम्पनी’ से सिने उपकरण खरीदे। पाथे कम्पनी के सहयोग से उन्होंने एक सिने कैमरा भी खरीद लिया और उसकी प्रोडक्शन टीम में सहायक कैमरामैन के रूप में काम सीखते हुए सिनेमेटोग्राफी में प्रवीणता प्राप्त कर ली। 1903 में उन्होंने अपनी ‘एल्फिंस्टन बायस्कोप’ के बैनर तले ‘काबुल के अमीर’ के जलूस को चित्रित किया।
1903 में हीरालाल सेन ने कलकत्ता के रंगमंचों पर खेले जा रहे अनेक नाटकों अलीबाबा, हरिराज, भ्रमर, बुंद्धदेव, सीताराम, डोले लैला आदि का छायांकन किया और अपनी बायस्कोप कम्पनी में उनका प्रदर्शन भी किया। देश की पहली विज्ञापन फिल्म बनाने का श्रेय भी हीरालाल सेन को जाता है। 1903 में उन्होंने ‘जबाकुसुम हेयर आयल’ और एडवर्डस एंटी-मलेरिया सोसिफिक फिल्में बनाई। उन्होंने देश की राजधानी कलकत्ता में आयोजित किंग एडवर्ड सप्तम के कारोनेशन का भी फिल्मांकन किया। अपनी फिल्मों की अपार सफलता से उत्साहित सेन ने 2 घंटे से अधिक अवधि की एक फिल्म बना कर 6 जून 1903 को क्लासिक थियेटर कलकत्ता में रिलीज की। उधर बंबई के सावे दादा ने कलकत्ता आकर किंग एडवर्ड सप्तम के कारोनेशन का जहां छायांकन किया, वहीं लार्ड कर्जन के दिल्ली दरबार जैसे महत्वपूर्ण समारोह पर भी फिल्म बनाई। गोमौंट, जार्जूंस मेंडल, पाथे, और वारविक कम्पनियों ने भी दिल्ली दरबार का छायांकन कर अपनी फिल्में रिलिज कीं।
1904 में बंबई के एक फिल्म उद्यमी मानेक डी.सेठना ने अपनी एक कम्पनी ‘टूरिंग सिनेमा कम्पनी’ के नाम से स्थापित की और नियमित रुप से खुले मैदानों में फिल्म शो देने शुरू किये। उनके द्वारा खुले मैदानों में प्रदर्शित दो रील की विदेशी फिल्म ‘लाइफ आफ क्राइस्ट’ ने तो पूरी बंबई में ही तहलका मचा दिया और इसे देखने के लिये भारी भीड़ उमड़ने लगी।
1905 में कलकत्ता के ज्योतिष सरकार ने बंगाल विभाजन के विरोध में विख्यात राजनेता सुरेन्द्रनाथ सेन के विरोध प्रदर्शन और उनकी सभा की कार्यवाही पर पहला राजनैतिक वृत्त चित्र ‘ग्रेट बंगाल पार्टीशिन मूवमैन्ट’ तैयार किया। इसी समय हीरालाल सेन ने भी एल्फिंस्टन बायस्कोप कम्पनी के बैनर तले हावड़ा ब्रिज को लेकर एक वृत चित्र का छायांकन किया। इसी वर्ष दक्षिण के कोयम्बटूर स्वामीकन्नू विन्सेन्ट ने एम. ड्यूपोंट नामक एक फ्रैंच व्यक्ति से एक प्रोजेक्टर खरीद कर टूरिंग थियेटर स्थापित किया और मद्रास, त्रिवेन्दरम, बंबई, लाहोर पेशावर आदि नगरों में जाकर फिल्म प्रदर्शन किए।
हीरालाल सेन ने 1906 में जे.एफ.मेडन की एल्फिंस्टन बायस्कोप कम्पनी के अन्तर्गत ही लगातार अनेक फिल्में बनाई, जिनमें ‘डांसिंग ऑफ इंडियन नॉच गर्ल्स’, ‘गोट सैकरीफाइस एट कालीघाट’, ‘ग्रांड मैसोनिक प्रोसेशन’, ‘ग्रांड पारेशनाथ प्रोसेशन’, और ‘रायल विजिट टू कैलकटा’ प्रमुख थीं।
1906 और 1911 के बीच फिल्म निर्माण के क्षेत्र में काफी विकास और उन्नति हुई। देशभर में सिनेमाओं की बढ़ती संख्या के कारण न केवल विदेशी फिल्मों का आयात बढ़ा बल्कि कलकत्ता और बंबई के साथ-साथ अन्य स्थानों पर भी फिल्म निर्माण होने लगा।
1907 में पेरिस के चार्ल्स पाथे ने, जो इस समय फिल्म निर्माण व प्रदर्शन के क्षेत्र में काफी प्रमुख व सशक्त व्यक्ति थे, बंबई में भी अपनी एक शाखा खोल दी। सिनेमा के क्षेत्र में 1907 का वर्ष एक क्रांतिकारी वर्ष रहा, जब जे.एफ.मैडन ने कलकत्ता के चौरंगी क्षेत्र में एक पक्का स्थायी सिनेमा हाल ‘एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस’ का निर्माण कर देश को पहला छविगृह दिया। इसके बाद तो धीरे-धीरे देश में सिनेमाओं का जाल सा फैलता चला गया।
1908 में बंबई की एक्सैल्सियर सिनेमेटोग्राफ ने ‘दि टैरोविल हैदराबाद फ्लड’ चित्र का निर्माण किया।
फिल्म प्रदर्शन व्यवसाय में बेहतर सम्भावनाओं को देखते हुए भाटवाड़ेकर उर्फ सावे दादा ने फिल्म निर्माण के कार्य को तिलांजली दे दी। इसका एक प्रमुख कारण यह भी था कि उनके भाई जो उनके साथ फिल्म निर्माण का कार्य देखते थे, उनका आकस्मिक निधन हो गया, जो सावे दादा के लिए एक जबरदस्त आघात था। बंबई के कुछ अन्य उद्यमियों अनंतराम परशुराम कारंदिकर, एस.एन.पाटनकर और वी.पी.दिवेकर ने, जो फिल्म निर्माण के प्रति काफी आकर्षित थे, सावे दादा से उनका सिने कैमरा खरीद लिया। सावे दादा ने मात्र 700 रूपये में यह कैमरा उन्हें बेच दिया।
1909 में बंबई के एक्सैल्सियर सिनेमेटोग्राफ ने बंबई के ऊपर एक वृत्त्चित्र ‘ए व्यू आफ बाम्बे’ का निर्माण किया।
1910 में फिल्म प्रदर्शक पी.बी.मेहता ने बंबई में अपने अमेरिकन-इडियन सिनेमा में ‘लाइफ आफ क्राइस्ट फिल्म का प्रदर्शन किया। बंबई के डी.एस.फालके ने कई बार इस फिल्म को देखा।





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