[पिछ्ले भाग 1 व भाग 2 में आपने पढ़ा कि किस प्रकार भारत में सिनेमा का विकास हुआ। बंबई से प्रारम्भ होकर सिनेमा कलकत्ता व दक्षिण भारत तक पहुँचा। धीरे धीरे तत्कालीन सिनेमा नें लोगों के दिमाग में अपनी जगह बना ली। उसी समय उदय हुआ दादा साह फाल्के का जिन्हें भारतीय हिन्दी सिनेमा का पितामह माना जाता है ....कैसे बनी भारत की पहली फिल्म...आइये इसी के बारे में जानते हैं इस भाग में...]
फिल्म निर्माण और फिल्म प्रदर्शन दोनों ही समान रूप से आगे बढ़ रहे थे। दिसम्बर 1911 में दिल्ली दरबार एवं कारोनेशन का समारोह फिल्म उद्यमियों के लिए एक बड़ा आकर्षण बनकर आया। देश विदेश के अनेक कैमरों में समारोह को कैद कर लिया गया। इस समारोह की फिल्म बनाने वालों में पाटकर, कारन्दीकर व दिवेकर के साथ-साथ प्रमुख थे एक अंग्रेज, चार्ल्स अरबन, जिन्होंने किनेमाकलर में समारोह का रंगीन छायांकन किया। इनके अलावा हीरालाल सेन, इम्पीरियल बायस्कोप, गोमौंट, एक्सेल्सियर सिनेमेटोग्राफ आदि ने भी दिल्ली दरबार पर लघु चित्र बनाये। ब्रिटेन की वोर्न एंड शैफर्ड ने इस समारोह को ‘देयर इम्पीरियल मैजेस्टीज़ इन डेली’ और एडवांस्ड बायोस्कोपी ने ‘देयर मेजेस्टीज़ इन बाम्बे’ नाम से बनाया। इसी वर्ष कलकत्ता के घाट रोड़ पर एक सिनेमा प्रेमी अनादिनाथ बोस ने ऑरोरा सिनेमा कम्पनी की स्थापना की जिसका उद्देश्य बंगाल में टूरिंग सिनेमा द्वारा जगह-जगह जाकर फिल्मों का प्रदर्शन करना था।
1912 का वर्ष भारतीय सिने इतिहास के विकास का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष था। इस वर्ष देशभर में जहां सबसे अधिक फिल्मों का निर्माण हुआ वहीं फिल्मों के स्तर में भी काफी सुधार हुआ। अधिकांश फिल्में डाक्यूमेंटरी के रूप में किसी एक विषय को या किसी घटना अथवा समारोह को लेकर तैयार की गईं। जैसे महालक्ष्मी घुड़दौड़, कोलाबा में कॉटन फायर, ग्रेट क्रिकेट मैच, गणपति महोत्सव और ब्रिटेन के राजा व महारानी के विभिन्न समारोह एवं यात्राएं। इसी वर्ष दो कथानक फिल्में बनाने का प्रयास भी किया गया। ए.पी.करिन्दकर, एस.एन.पाटनकर और वी.पी.दिवेकर ने सावे दादा से खरीदे गए सिने कैमरे से 1000 फिट लम्बी एक मिनी-फीचर फिल्म ‘सावित्री’ की शूटिंग की। पौराणिक विषय पर आधारित इस फिल्म में अहमदाबाद की तरुणी नर्मदा मांडे, मंच अभिनेता के.जी.गोखले और दिवेकर ने स्वयं प्रमुख भूमिकाएं अदा कीं; फिल्म में गोखले ने जयमुनि और दिवेकर ने महर्षि व्यास की भूमिकाएं अदा की थीं। किन्तु फिल्म निर्माण में कुछ तकनीकि त्रुटियों के कारण, यह फिल्म छविगृहों में प्रदर्शित न हो सकी।
इस वर्ष की एक दूसरी महत्वपूर्ण फिल्म थी ‘पुंडालिक’। बंबई के मंगलदास वाड़ी क्षेत्र के एक थियेटर में ‘श्रीपद संगीत मंडली’ नामक एक व्यवसायिक थियेटर ग्रुप सन् 1911 से रामराव कीर्तिकर द्वारा लिखित एक पौराणिक नाटक ‘पुंडालिक’ मंचित करता आ रहा था। ‘पुंडालिक’ की लोकप्रियता को देखकर एडवोकेट प्रेस आफ इंडिया के मैनेजर नारायण गोविंद चित्रे उर्फ नाना भाई चित्रे के मस्तिष्क में एक विचार उठा कि क्यों न इस नाटक की ही फिल्म बना ली जाए। उन्होंने कॉरोनेशन सिनेमेटोग्राफ थियेटर के प्रबंधक आर.पी. टिपनिस से परामर्श व सहायता लेकर फिल्म बनाने का निर्णय लिया। छांयाकन के लिये उन्होंने ब्रिटिश कम्पनी ‘बोर्न एंड शेफर्ड कम्पनी’ से सहयोग लिया जो कि सिनेमा के क्षेत्र में पर्दापण करना चाह रही थी। इस कम्पनी ने नानाभाई चित्रे को एक अंग्रेज कैमरामैन जानसन की सेवाएं समर्पित करा दी। आर.जी. टोर्ने उर्फ दादा साहब टोर्ने को निर्देशन का कार्यभार सौंपा गया। दादा साहब टोर्ने ने नाट्यशाला में एक ऐसे स्थान पर कैमरा सेट कर दिया, जहां से मंच पर अभिनीत पूरा ‘पुंडालिक’ नाटक स्पष्ट दिखाई देता था। लगभग 8000 फीट लम्बी यह फिल्म 18 मई 1912 को कॅारोनेशन सिनेमेटोग्राफ, बंबई में प्रदर्शित हुई। कथानक के साथ भारत की यह पहली थियेट्रिकल फिल्म थी।
इसी वर्ष गौमोंट कम्पनी ने दि कारोनेशन आफ महाराजा होलकर एट इंदौर, एक्सेल्सियर सिनेमेटोग्राफ ने ‘गार्डन पार्टी आफ सर शापुरजी ब्रोका’ और ग्लोबट्रोटर बायस्कोप कम्पनी ने ‘देयर मैजेस्टीज इन कैलकटा’ जैसे चित्र बनाकर ऐतिहासिक क्षणों को अपने कैमरों में कैद किया।
वर्ष 1912 की सबसे रोमांचक घटना थी 42 वर्षीय एक ‘फिल्म दीवाने’ धुंधिराज गोविंद फालके उर्फ दादा साहफालके की फिल्म तकनीक सीखने के लिए 2 फरवरी 1912 को इंग्लैंड यात्रा। इस यात्रा के लिए दादा साहब ने न केवल कर्जा जुटाया, वरन् अपनी इंश्योरेंस पालिसी तक को गिरवी रख दिया। फालके ने बंबई में 1910 के अमेरिका इंडिया सिनेमा में रंगीन फिल्म ‘दि लाइफ आफ क्राइस्ट’ देखी थी, तभी से उनके मस्तिष्क में हर समय भगवान राम व कृष्ण की लीलाओं की चलती फिरती तस्वीरें घूमती रहती थीं। ऐसी ही एक भारतीय फिल्म का निर्माण करना उनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य बन चुका था। बंबई के एक पुस्तक विक्रेता से प्राप्त एक मैनुअल ‘दि ए बी सी आफ सिनेमेटोग्राफी’, कुछ फिल्म कैटलॅाग तथा लंदन से मंगाए गए कुछ उपकरण फिल्म निर्माण के उनके संकल्प की दिशा में उन्हें कुछ प्रारम्भिक जानकारी तो दे सके, किन्तु व्यवहारिक ज्ञान नहीं। अतः इंग्लैंड के वाल्टन में उन्होंने सेसिल हेपवर्थ से फिल्म विद्या का ज्ञान प्राप्त किया।
अप्रैल 1912 में फालके इंग्लैंड से वापस लौटे। अब उनके पास फिल्मों का ‘ए बी सी’ ज्ञान ही नहीं बल्कि अंग्रेज फिल्म निर्माता सेसिल हैपवर्थ का पूरा मार्ग दर्शन, विलियमसन सिने कैमरा, रॉ फिल्म और फिल्म डैवलप व प्रिंट करने का पूरा सामान साथ में था। बस यदि कुछ नहीं था, तो फिल्म निर्माण के लिये पर्याप्त धन। इंग्लैंड से लौटकर उन्होंने बंबई में अपनी ‘फाल्के एंड कम्पनी’ स्थापित की।
फालके ने अपने कुछ सामर्थ्यपूण मित्रों से आर्थिक सहयोग मांगा। फालके को यह सहयोग मिला तो अवश्य, किन्तु 100-200 फिट लम्बी कुछ फिल्में बनाकर दिखाने व अपनी दक्षता प्रदर्शित करने के बाद। उनका प्रथम प्रयास था-‘दि ग्रोथ आफ ए पलांट’।
फिर…… अनेक समस्याओं और कठिनाइयों से जूझते हुए भारत की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरीशचन्द्र’ सन् 1912 में प्रारम्भ हुई। प्रारम्भ में तो दादा साहब को तारामती का रोल अदा करने के लिए कोई महिला पात्र तक न मिल सकी। रंगमंच पर व सिनेमा में काम करना समाज में बड़ी हेय दृष्टि से देखा जाता था। किसी सभ्य सुसंस्कृत और शिक्षित महिला का इस क्षेत्र में पदार्पण तो असम्भव था। दादा साहब ने अपनी हिरोइन को प्राप्त करने के लिए जगह-जगह की ठोकरें खाईं; यहां तक कि उनको बंबई के रेड लाइट एरिया तक में जाकर वेश्याओं से आग्रह करना पड़ा, किन्तु उन्होंने भी इसे घटिया व ओछा व्यवसाय बताकर अस्वीकार कर दिया। उन्होंने संशय व्यक्त किया कि यदि उन्होंने फिल्म में काम करना स्वीकार कर लिया तो उनका वेश्या समाज उनको जात-बिरादरी से बाहर निकाल देगा। ऐसी अवस्था में दादा साहब ने महिला अभिनेत्री के स्थान पर किसी पुरुष पात्र को ही तारामती बनाने तक कि सोच डाली, मगर इसके लिए कोई तैयार नहीं हुआ। इसी उधेड़बुन में दादा साहब ने एक दिन दादर के एक होटल में चाय का आर्डर दिया तो जो लड़का चाय लेकर आया, दादा उसे देखते रह गए। उस लड़के के अभी दाढ़ी-मूंछें भी नहीं आई थी और वह बिल्कुल लड़की की तरह लगता था। चाय पीने के बाद अच्छी ‘टिप’ देने के साथ दादा ने लड़के को होटल के बाहर मिलने को बुलाया। बाहर आने पर दादा ने लड़के को अपने दफ्तर में बुलाया और काफी समझा बुझा कर तारामती के रोल के लिए पक्का कर लिया। इस लड़के का नाम सालुंके था। इस फिल्म की शूटिंग दादा साहब ने बंबई में दादर स्थित मथुरा भवन में अपनी फैक्टरी (स्टूडियो), और नासिक के विभिन्न स्थलों में की। फिल्म की पूरी शूटिंग दिन के सीधे प्रकाश में आउट डोर में की गईं। फिल्म के कथानक के अनुसार जंगल, महल आदि के सैट्स के स्थान में रंगमंच मे प्रयोग किए जाने वाले पर्दों को पृष्ठभूमि में इस्तेमाल किया गया। सम्पूर्ण फिल्म आठ महिने में बनकर तैयार हुई।
भारत की प्रथम ‘स्वदेशी’ फिल्म ‘राजा हरीशचन्द्र’ का बंबई के ऑलम्पिया सिनेमा में पहला प्रीव्यू शो 21 अप्रैल 1913 को हुआ । बाद में 3 मई 1913 को बंबई के कॅारोनेशन सिनेमेटोग्राफ थियेटर में 3700 फीट लम्बी 4 रील की इस फिल्म ‘राजा हरीशचन्द्र’ का व्यवसायिक प्रदर्शन शुरू किया गया। वास्तव में यही वह दिन था, जब भारतीय फिल्म उद्योग का जन्म हुआ था। क्या ही अच्छा होता कि 3 मई का दिन देश में प्रत्येक वर्ष ‘भारतीय फिल्म दिवस’ के रूप में मनाया जाता और भारतीय फिल्म उद्योग के जनक दादा साहब फालके द्वारा स्थापित एक उत्कृष्ठ फिल्म संस्कृति को स्मरण करते हुए हम आगे बढ़ते।
1913 में प्रदर्शित फालके फिल्म्स कृत भारत के प्रथम मूक कथाचित्र ‘राजा हरीशचन्द्र’ के निर्माण के साथ ही, देश में एक नये ‘फिल्मयुग’ का प्रारंभ हुआ। पर्दे पर चलती, फिरती, नाचती विशाल तस्वीरों ने दर्शकों का मन मोह लिया। फिल्म निर्माण और छविगृहों के क्षेत्र में देशभर में एक क्रान्ति आ गई। देश के विभिन्न नगरों में फिल्म निर्माण प्रारम्भ हो गये, जिनको प्रदर्शित करने के लिए उस समय देशभर में 40 से अधिक छविगृह थे।
देश में बनी यह पहली स्वदेशी फिल्म ‘राजा हरिशचंद्र’ 1914 में लंदन में दिखाई गई।





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