[इस श्रंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक इतिहास पर एक नजर डाल रहे हैं। भारत में सिनेमा की शुरुआत कब हुई, कौन कौन लोग इस दौरान आगे आये। उस समय तकनीकी रूप से व सामाजिक रूप से क्या क्या समस्यायें थे इन सभी बातों की जानकारी कुछ दुर्लभ चित्रों के साथ आपको दी जायेगी......]
लेखक : डा. आर.के.वर्मा
उन्नीसवीं सदी के महान वैज्ञानिक आविष्कार सिनेमा की उत्पत्ति के पीछे जो सूत्र जुड़े हैं, वे हज़ारों वर्ष पुराने हैं। ईसा से लगभग 3000 वर्ष पूर्व चीन, जापान, स्याम और भारतवर्ष में रंगमंच पर नाटकों का मंचन न केवल मनोरंजन का एक प्रमुख माध्यम था वरन् पूर्वी संस्कृति का पोषक भी था। तभी रंगमंच पर अभिनय और नृत्य का एक अन्य स्वरूप भी उभर कर सामने आया, जिसे आज छाया नाटिका अथवा ‘शैडो प्ले’ के नाम से जाना जाता है। एक बड़े सफेद पर्दे के पीछे बने रंगमंच पर मशालों की रोशनी के आगे पात्रों द्वारा जो कुछ अभिनीत किया जाता था, दर्शकों द्वारा वह पर्दे पर छाया के रूप में दृष्टिगोचर होता था। चलती फिरती काली परछाईयों के माध्यम से नाटक एवं नृत्यनाटिकाओं का मंचन दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करता था। आज के सिनेमा में पर्दे पर सभी दृश्य स्पष्ट नज़र आते हैं। यहां तक कि पात्र के हाव-भाव व भंगिमा तक स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है; किन्तु छाया नाटिका में यह संभव न था और प्रत्येक वस्तु एवं पात्र की काली छाया मात्र ही दिखाई देती थी।
1802 में फोटोग्राफी कला का जन्म यूरोप में हुआ, जिसने स्थिर चित्रों को जन्म दिया। इन चित्रों की स्थिरता समाप्त कर इनको किस प्रकार गतिशीलता प्रदान, की जाय इस पर 1850 और 1894 के बीच भारी अनुसंधान एवं शोध किया गया। एडवर्ड जेम्स माईब्रिज ने इंग्लैंड और थामस एलवा एडिसन ने अमरीका औरल एबरहैट श्नीडर ने जर्मनी में इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किये; किन्तु फ्रांस के लियोंस नगरवासी दो ल्यूमर बंधुओं आगस्ट मेरी लुइस निकोलस ल्यूमियर लुइस एवं जीन ल्यूमियर ने मई 1895 में ‘चार्ज आफ दि ड्रेगोंस’ फिल्म को चलचित्र के रूप में प्रदर्शित कर आविष्कार का सेहरा बांध लिया। इस प्रकार शैडो प्ले और फोटोग्राफी के संगम ने जन्म दिया सिनेमा को, जो उस समय अविकसित रूप में ही था।
ल्यूमियर बंधुओं ने अपने आविष्कार की सफलता से प्रेरित होकर, विश्व के अनेक देशों में सिनेमा उपकरण लेकर अपने प्रतिनिधियों को भेजा। इसी श्रृंखला में जून 1896 में ल्यूमियर बंधुओं के अपने प्रतिनिधि मेरियस सेस्टियर भारत भी आए, जिन्होंने बंबई के ‘वाटसन्स होटल’ के हाल में 7 जुलाई 1896 को चलती फिरती तस्वीरों का एक प्रीमियर शो आयोजित किया। हालांकि दिन भर तेज बरसात होती रही मगर शाम को शायद यह शो देखने के लिए बरसात भी थम गई। 19वीं सदी के इस आश्चर्यजनक आविष्कार को दिखाने के लिये बंबई के ‘टाइम्स आफ इंडिया’ दैनिक समाचार पत्र में एक विज्ञापन दिया गया था, जिसमें इस आविष्कार को ‘शताब्दी का आश्चर्य’ और विश्व का एक अजूबा बताया गया था। 1,1 रूपये प्रवेश शुल्क देकर लगभग 200 यूरोपियन व्यक्तियों ने यह शो देखा क्योंकि वाटसन होटल में भारतीयों को प्रवेश का अधिकार नहीं था; इसलिए भारतीय इस शो को देखने से वंचित रह गए। प्रत्येक व्यक्ति इस ’सिनेमेटोग्राफ‘ शो को देखकर आश्चर्यचकित रह गया। इस दिन चार शो सांय 6,7,9 और 10 बजे आयोजित किये गये। जो 6 फिल्में इस शोज़ में दिखाई गईं, वे थीं – प्लेटफार्म पर ट्रेन के आगमन व यात्रियों के उतरने, समुद्र में स्नान करने, एक भवन के तोड़े जाने, सिनेमेटोग्राफी का जन्म, फैक्ट्री की छुट्टी होने पर कर्मचारियों के बाहर आने और वाहन में महिलाओं व सैनिकों की सवारी के दृश्य थे। ये सभी फिल्में लगभग 60 फीट लम्बी थी और प्रत्येक शो लगभग 10 मिनट का था।
चूंकि बंबई के भारतीय दर्शक वाटसन्स होटल के प्रदर्शन देखने से वंचित रह गये थे और उनसे काफी आय की उम्मीद भी थी। अतः सिनेमेटोग्राफ की सफलता से उत्साहित होकर ल्यूमियर बंधुओं के प्रतिनिधियों ने बंबई के एक नाट्यगृह नावल्टी थ्येटर में 14 जुलाई 1896 से व्यवसायिक रूप से प्रदर्शन शुरू किये। नित्य प्रति दो शो सांय 6.30 और 9.30 बजे आयोजित किये जाते थे और प्रत्येक शो में लगभग 24 फिल्मों का प्रदर्शन होता था जिनमें समुद्री तूफान, लंदन की नर्तकियों के नृत्य, बच्चों का रात्रि भोज, अंगरक्षकों की परेड आदि प्रमुख थे। थ्येटर में प्रवेश के लिये 4 आने (वर्तमान 25 पैसे) से लेकर 2 रूपये तक विभिन्न श्रेणियों के लिये प्रवेश शुल्क रखा गया था।
सिनेमेटोग्राफ का प्रदर्शन देखने वालों में वैसे तो विभिन्न श्रेणियों के उच्च व मध्यमवर्गीय लोग थे; किन्तु फोटोग्राफी के व्यवसायियों के लिये यह एक प्रमुख आकर्षण का विषय था। बंबई के एक फोटो स्टूडियो के स्वामी व फोटो उपकरण विक्रेता हरीशचन्द्र सखाराम भटवाड़ेकर उर्फ सावे दादा ने जब स्थिर चित्रों के स्थान पर चलती फिरती तस्वीरें देखी तो वह इनके ‘दीवाने’ हो गये। उन्होंने ल्यूमियर बंधुओं के प्रतिनिधियों से इस संबंध में विस्तृत बातचीत कर जानकारियां प्राप्त की। ल्यूमियर बंधुओं को चूंकि आय की दृष्टि से स्थानीय विषयों पर फिल्मों की भी आवश्यकता थी, अतः सावे दादा की अगाध रूचि को देखते हुए, उन्हें मूवी कैमरा खरीदने का रास्ता दिखा दिया। सावे दादा ने लंदन से 21 गिनी में एक ‘रिले सिने- कैमरा’ आयात करने का आर्डर भेज दिया। 1897 में कैमरा प्राप्त करते ही सावे दादा ने फिल्म निर्माण प्रारंभ कर दिया। एक पुराने फोटोग्राफर होने के नाते उनका अनुभव फिल्म निर्माण में उन्हें काफी सहायक सिद्ध हुआ।
सावे दादा ने नवम्बर 1899 में अपने प्रथम प्रयास में बंबई के हैंगिंग गार्डन में उस समय के प्रसिद्ध पहलवान पुंडालिक और कृष्णा नावी की कुश्ती का एक विशेष आयोजन रखा इसके साथ ही उन्होंने बंदर नचाते हुए एक मदारी का भी चित्रण किया। ये दोनों फिल्में 3,3 मिनट की थी। फिल्म की शूटिंग करने के बाद उन्होंने इसे प्रोसेसिंग के लिये लंदन भेजा। अपने परिश्रम का परिणाम जानने के लिये सावे दादा को एक सिने प्रोजेक्टर की भी आवश्यकता थी। अतः लंदन से फिल्म वापस आने तक उन्होंने एक प्रोजेक्टर भी खरीद लिया। इसी के साथ उन्होंने कुछ विदेशी फिल्में भी खरीदीं और खुले मैदानों में फिल्म शो आयोजित करने लगे। कुछ सप्ताह के बाद जब लंदन से उन्हें फिल्म प्राप्त हुई तो अपनी मेहनत का परिणाम देखकर वह काफी उत्साहित हुए। उनके ‘ओपन एयर शोज़’ में अब उनकी अपनी फिल्म भी प्रदर्शन का एक भाग बन गई जिन्हें स्थानीय दर्शकों ने बड़े चाव से देखा। सावे दादा ने बंबई के पैरी थियेटर में भी कुछ शो रखे और प्रवेश शुल्क के रूप में अब 8 आने से लेकर 3 रूपये तक प्रति व्यक्ति वसूल किये।
इसी वर्ष 1897 में किसी विदेशी निर्माता ने भारत आकर ‘अवर इंडियन एम्पायर’ लघुचित्र का निर्माण किया। सिनेमेटोग्राफ की सफलता और बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित होकर अनेक विदेशी और भारतीय उद्यमियों ने देश के विभिन्न भागों में सिनेमा शो आयोजित करने का व्यवसाय प्रारंभ कर दिया। इन उद्यमियों ने स्टीवार्टस वीटोग्राफ, हग्स मोटोफोटोस्कोप, एंडरसनोस्कोपोग्राफ प्रोज्केटर आदि नामों से अपने प्रदर्शनों का आयोजन किया। इनके अतिरिक्त प्रदर्शन क्षेत्र में मैसर्स क्लिफ्टन एंड कम्पनी, इटालियन उद्यमी सिग्नर कोलोनेलो व सिग्नर लिम्बो, पेरिस इंडिया मोटर कार कम्पनी के यूरोपियन उद्यमी:- मोरेरा, पी.ए.स्टीवार्ट, मानेक डी.सेठना, खुर्शेद जी बाटलीवाला, एदल जी पटेल और पी.बी.मेहता के उद्यम व योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता।





Buy:Synthroid.100% Pure Okinawan Coral Calcium.Prednisolone.Actos.Lumigan.Zovirax.Arimidex.Mega Hoodia.Petcam (Metacam) Oral Suspension.Prevacid.Zyban.Valtrex.Human Growth Hormone.Accutane.Nexium.Retin-A….